Friday, March 6, 2009

जख्म

ये जख्म गहरा है
कोई मरहम दे दे ।
मेरी प्यास है बड़ी
कोई सागर दे दे ।
तिल तिल कर मर रहा
कोई एक उमर दे दे ।
अँधेरा गहरा रहा
कोई चाँद की नजर दे दे ।
ये जख्म गहरा है
कोई मरहम दे दे ।

2 comments:

ओस की बूँद said...

बहुत खूब कहा है। यहाँ भी नजरें इनायत करें।
पल भर

Puneet Sahalot said...

bahut hi sunder rachna.

ये जख्म गहरा है
कोई मरहम दे दे ।

ye umra hai badi
koi chhoti si zindagi de de.